Baba Banda Singh Bahadur was the first Singh King . Guru Gobind Singh Ji taught him the basic principles of sikh religion and administered Amrit to Lachhman Das, admitting him to Sikh fold. The Guru renamed him as Banda Singh.

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धन धन बाबा बन्दा सिंह बहादुर, जहाँ सिमरिये तहाँ हाज़िर .

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गुरु गोबिंद सिंह जी ने ,माधो दास नू अमृत छक्का के नाम दिता

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             "बाबा बंदा सिंह बहादुर "  

बंदा बहादुर, माधेदास से बंदा बहादुर केसे बना

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श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी दक्षिण भारत में गुरमति का प्रचार प्रसार करने के लिए विचरण कर आगेबढ़ रहे थे कि महाराष्ट्र के स्थानीय लोगों ने गुरूदेव को बताया कि गोदावरी नदी के तट पर एक वैरागी साधू रहता है जिसने योग साध्ना के बल से बहुत सी सिद्धियाँ प्राप्त की हुई हैं। जिनका प्रयोग करके वह अन्यमहापुरूषों का मजाक उड़ाता है। इस प्रकार वह बहुत अभिमानी प्रवृत्ति का स्वामी बन गया है। यह ज्ञात होनेपर गुरूदेव के हृदय में इस चंचल प्रवृत्ति के साधू की परीक्षा लेने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। अतः वह नादेड़ नगरके उस रमणीक स्थल पर पहुँचे, जहाँ इस वैरागी साधू का आश्रम था। संयोगवश वह साधू अपने आश्रम में नहींथा, उद्यान में तप साध्ना में लीन था। साधू के शिष्यों ने गुरूदेव का शिष्टाचार से सम्मान नहीं किया। इसलिएगुरूदेव रूष्ट हो गये और उन्होंने अपने सेवकों ;सिक्खोंद्ध को आदेश दिया कि यहीं तुरन्त भोजन तैयार करो।इस कार्य के लिए यहीं आश्रम में बकरे भÚटका डालो। उनके आदेश का पालन किया गया। बकरों की हत्यादेखकर वैरागी साध्ु के शिष्य बौखला गये किन्तु वे अपने को असमर्थ और विवश अनुभव कर रहे थे। सिक्खोंने उनके आश्रम को बलात् अपने नियन्त्राण में ले लिया था और गुरूदेव स्वयँ वैरागी साध्ु के पलंग पर विराजमानहोकर आदेश दे रहे थे। वैरागी साधू के शिष्य अपना समस्त सिद्धियाँ का बल प्रयोग कर रहे थे जिस सेबलात् नियन्त्राकारियों का अनिष्ट किया जा सके किन्तु वह बहुत बुरी तरह से विफल हुए। उनकी कोई भीचमत्कारी शक्ति काम नहीं आई। उन्होंने अन्त में अपने गुरू वैरागी साधू माधेदास को सन्देश भेजा कि कोईतेजस्वी तथा पराकर्मी पुरूष आश्रम में पधरे हैं जिनको परास्त करने के लिए हमने अपना समस्त योग बल प्रयोगकरके देख लिया है परन्तु हम सफल नहीं हुए। अतः आप स्वयँ इस कठिन समय में हमारा नेतृत्त्व करें। संदेशपाते ही माधेदास वैरागी अपने आश्रम पहुँचा। एक आगन्तुक को अपने पलंग ;आसनद्ध पर बैठा देखकर, अपनीअलौकिक शक्तियों द्वारा पलंग उलटाने का प्रयत्न किया परन्तु गुरूदेव पर इन चमत्कारी शक्तियों का कोईप्रभाव न होता देख,माधे दास जान गया कि यह तो कोई पूर्ण पुरूष हैं, साधरण व्यक्ति नहीं। उसने एक दृष्टिगुरूदेव को देखा – नूरानी चेहरा और निर्भय व्यक्ति। उसने बहुत विनम्रता से गुरूदेव से प्रश्न किया – आप कौनहैं? गुरूदेव ने कहा – मैं वही हूँ जिसे तू जानता है और लम्बे समय से प्रतीक्षा कर रहा है।माधेदास – तभी माधेदास अन्तर्मुख हो गया और अन्तःकरण में झाँकने लगा। कुछ समय पश्चात्सुचेत हुआ और बोला – आप गुरू गोबिन्द सिंह जी तो नहीं?गुरूदेव – तुमने ठीक पहचाना है मैं वही हूँ।माधे दास – आप इध्र कैसे पधरे? मन में बड़ी उत्सुकता थी कि आप के दर्शन करूँ किन्तु कोईसंयोग ही नहीं बन पाया कि पँजाब की यात्रा पर जाऊँ। आपने बहुत कृपा की जो मेरे हृदय की व्यथा जानकरस्वयँ पधरे हैं।गुरूदेव – हम तुम्हारे प्रेम में बाँध्े चले आये हैं अन्यथा इध्र हमारा कोई अन्य कार्य नहीं था।माधे दास – मैं आप का बंदा हूँ। मुझे आप सेवा बताएं और वह गुरू चरणों में दण्ड्वत प्रणाम करनेलगा।गुरूदेव – उसकी विनम्रता और स्नेहशील भाषा से मंत्रामुग्ध् हो गये। उसे उठाकर कंठ से लगाया औरआदेश दिया – यदि तुम हमारे बंदे हो तो फिर सँसार से विरक्ति क्यों? जब मज़हब के जनून में निर्दोष लोगोंकी हत्या की जा रही हो, अबोध् बालकों तक को दीवारों में चुना जा रहा हो। और आप जैसे तेजस्वी लोगहथियार त्याग कर सन्यासी बन जायें तो समाज में अन्याय और अत्याचार के विरू( आवाज कौन बुलंद करेगा?यदि तुम मेरे बंदे कहलाना चाहते हो तो तुम्हें समाज के प्रति उत्तरदायित्त्व निभाते हुए कर्त्तव्यपरायण बनना हीहोगा क्योंकि मेरा लक्ष्य समाज में भ्रातृत्त्व उत्पन्न करना है। यह तभी सम्भव हो सकता है जब स्वार्थी, अत्याचारीऔर समाज विरोध्ी तत्त्व का दमन किया जाये। अतः मेरे बंदे तो तलवार के ध्नी और अन्याय का मुँहतोड़ने का संकल्प करने वाले हैं। यह समय सँसार से भाग कर एकान्त में बैठने का नहीं है। तुम्हारे जैसे वीरऔर बलिष्ठ यो(ा को यदि अपने प्राणों की आहुति भी देनी पड़े तो चूकना नहीं चाहिए क्योंकि यह बलिदान घोरतपस्या से अध्कि फलदायक होता है।माधेदास ने पुनः विनती की कि मैं आपका बंदा बन चुका हूँ। आपकी प्रत्येक आज्ञा मेरे लिएअनुकरणीय है। फिर उसने कहा – मैं भटक गया था। अब मैं जान गया हूँ, मुझे जीवन चरित्रा से सन्त औरकर्त्तव्य से सिपाही होना चाहिए। आपने मेरा मार्गदर्शन करके मुझे कृत्तार्थ किया है जिससे मैं अपना भविष्यउज्ज्वल करता हुआ अपनी प्रतिभा का परिचय दे पाउँगा।गुरूदेव, माधे दास के जीवन में क्रान्ति देखकर प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे गुरूदीक्षा देकर अमृतपानकराया। जिससे माधेदास केशधरी सिंह बन गया। पाँच प्यारों ने माधेदास का नाम परिवर्तित करके गुरूबख्शसिंह रख दिया। परन्तु वह अपने आप को गुरू गोबिन्द सिंह जी का बन्दा ही कहलाता रहा। इसी लिए इतिहासमें वह बंदा बहादुर के नाम से प्रसि( हुआ।गुरूदेव को माधेदास ;बंदा बहादुरद्ध में मुग़लों को परास्त करने वाला अपना भावी उत्तराध्किारी दिखाईदे रहा था। अतः उसे इस कार्य के लिए प्रशिक्षण दिया गया और गुरू इतिहास, गुरू मर्यादा से पूर्णतः अवगतकराया गया। कुछ दिनों में ही उसने शस्त्रा विद्या का पुनः अभ्यास करके फिर से प्रवीणता प्राप्त कर ली। जबसभी तैयारियाँ पूर्ण हो चुकी तो गुरूदेव ने उसे आदेश दिया – ‘कभी गुरू पद को धरण नहीं करना में न बंध्ना, अन्यथा लक्ष्य से चूक जाओगे। पाँच प्यारों की आज्ञा मानकर समस्त कार्य करना। बंदा बहादुर ने इन उपदेशोंके सम्मुख शीश झुका दिया। तभी गुरूदेव ने अपनी खड़ग ;तलवारद्ध उसे पहना दी। किन्तु सिक्ख इस कार्य सेरूष्ट हो गये। उनकी मान्यता थी कि गुरूदेव की कृपाण ;तलवारद्ध पर उनका अध्किार है, वह किसी और कोनहीं दी जा सकती। उन्होंने तर्क रखा कि हम आपके साथ सदैव छाया की तरह रहे हैं जब कि यह कल कायोगी आज समस्त अमूल्य निध् िका स्वामी बनने जा रहा है।गुरूदेव ने इस सत्य को स्वीकार किया। खड़ग के विकल्प में गुरूदेव जी ने उसे अपने तरकश में सेपाँच तीर दिये और वचन किया जब कभी विपत्तिकाल हो तभी इनका प्रयोग करना तुरन्त सफलता मिलेगी।आशीर्वाद दिया और कहा – जा जितनी देर तू खालसा पंथ के नियमों पर कायम रहेगा। गुरू तेरी रक्षा करेगा।तुम्हारा लक्ष्य दुष्टों का नाश और दीनों की निष्काम सेवा है, इससे कभी विचलित नहीं होना। बन्दा सिंह बहादुरने गुरूदेव को वचन दिया कि वह सदैव पंच प्यारों की आज्ञा का पालन करेगा। गुरूदेव ने अपने कर-कमलोंसे लिखित हुक्मनामे दिये जो पँजाब में विभिन्न क्षेत्रों में बसने वाले सिक्खों के नाम थे जिसमें आदेश था कि वहसभी बन्दा सिंह की सेना में सम्मिलित हो कर दुष्टों को परास्त करने के अभियान में कार्यरत हो जाएं और साथही बन्दा सिंह को खालसे का जत्थेदार नियुक्त करके ‘बहादुर’ खिताब देकर नवाज़ा और पाँच प्यारों – भाईविनोद सिंह, भाई काहन सिंह, भाई बाज सिंह, भाई रण सिंह और रामसिंह की अगुवाई में पँजाब भेजा। उसेनिशान साहब ;झंडाद्ध नगाड़ा और एक सैनिक टुकड़ी भी दीऋ जिसे लेकर वह उत्तरभारत की ओर चल पड़ा।

(सोजन्य : क्रन्तिकारी गुरु नानक देव चैरिटेबल ट्रस्ट , लेखक : सरदार जसबीर सिंह).

बंदा सिंह बहादुर की सरहिन्द पर विजय

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बादशाह बहादुरशाह को पंजाब में सिक्खों के विद्रोह करने के समाचार सन्1709 के अंत मे प्राप्त होने
लगे थे। तब वह अपने भाई कामबख्श के विरू( दक्षिण में यु( करने गया हुआ था। लोटते समय उसे अजमेर
के निकट समाचार मिला कि सिक्खों ने सरहिन्द पर विजय प्राप्त कर ली है और वहां के सूबेदार वजी़द खान
को मौत के घाट उतार दिया है और उन्होंने अपने नेता बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में पंजाब के अध्किांश भाग
पर नियन्त्राण कर लिया है। इन दुःखत समाचारों के मिलने पर सम्राट के क्रोध् की सीमा न रही। उसने राजपूताने
के अड़ियल राजा जय सिंह कुशवाहा तथा जसवन्त सिंह राठौर की मरम्मत करने का काम बीच में ही छोड़कर,
वह स्वयं ही सिक्खों को समाप्त करने के लिए पंजाब की तरफ बढ़ा। उसने सभी उत्तरी भारत के फौजदारों और
गवर्नरों के नाम आदेश जारी कर दिये कि वे सभी मिलकर बंदा सिंह बहादुर और उसके साथियों कि विरू(
सम्मिलित गठजोड़ स्थापित करें। बादशाही राजधनी के इतना निकट इस प्रकार का सामान्य जनता का विद्रोह
जैसा कि सिक्खों ने कर दिया था, राजपूतों के झगडो़ से अध्कि भयानक था तथा भविष्य के लिए कई समस्यायें
उत्पन्न कर सकता था। अतः बादशाह ने राजपूतों को फिर कभी निपटने के लिए छोटकर सीध पंजाब की ओर
सैन्य बल का रूख किया।
इस समय बादशाह तथा वजीर मुनइस खान के मध्य मतभेद हो गया। वजीर का कहना था कि इतनेबडे़ प्रतापी बादशाह के लिए सिक्खों जैसे तुच्छ विद्रोहियों के विरू( स्वयं आक्रमणकारी होना उसकी शान केविरू( है। परन्तु इस मतभेद के रहते भी बादशाह ने इस विद्रोह को बहुत गम्भीरता से लिया और स्वयं उसेकुचलने के विचार से सीध ही समस्त सेना के साथ पंजाब की ओर बढ़ा चला आया।उसने सबसे पहले हिन्दुओं और सिक्खों के बीच पहिचान के लिए अपने उन सभी अध्किारियों औरकर्मचारियों को चाहे वे उसके दरबार में थे या राज्य के अन्य कार्यालयों मे, आज्ञा दी कि वे सभी अपनीदाढी-मूंछें मुंडवा दे ताकि हिन्दु व सिक्ख को पहचानने में कोई कठिनाई न हो और यही आदेश उसने फिरसामान्य जनता के लिए भी लागू करने को कहा।बादशाह को दल खालसा के नायक बंदा सिंह द्वारा नई मुद्रा जारी करने की भी सूचना दी गई और
बताया गया कि उसने जमीदारी नियामावली समाप्त कर दी है और किसानों को समस्त अध्किार देकर उन्हेंसीध्े लगान सरकार को देने को कहा है। सम्राट बहादुर शाह ने अपने दो सेनापतियों महावत खान व फीरोज़ खान मेवाती के नेतृत्व में लगभग 60 हजार सैनिकों का सैन्य बल सिक्खों को कुचलने के लिए भेजा। इस समय सिक्खों की शक्ति बिखरी हुई थी। अध्किांश सिंह अपने जत्थेदारों के साथ यमुना पार उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और जलालाबाद के क्षेत्रों में सर्घषरत थे। इस मुहिम में बहुत से सिंह शहीद हो गये थे और जलालाबाद के किले के घेराव के कारण बडा़ उलझाव उत्पन्न हो गया। जो न चाहते हुए भी समय की बर्बादी का कारण बन गया। इसलिए यहां के सिक्ख सैनिक समय अनुसार लौट नहीं सके। बाकी के सैन्यबल पंजाब के माझा व दुआबा क्षेत्रा के परगनों मेंजगह-जगह बिखरे हुए प्रशासनिक व्यवस्था करने में जुटे हुए थे। सरहिन्द में केवल प्रबन्ध् योग्य सेना ही रखीहुई थी।
इन सब की संख्या बडे़ यु(ों में भाग लेने योग्य नही थी। दूसरी तरफ मुग़ल शासक पूरी तैयारी सेहिन्दुस्तान भर में से सेना एकत्रा कर लाऐ थे। अतः ऐसे समय में सिक्खों की विजय की कल्पना भी नहीं कीजा सकती थी। फिर भी जत्थेदार विनोद सिंह तथा जत्थेदार राम सिंह को ही अपने थोडे़ से सिपाहियों के साथफिरोजखान की शाही सेना के साथ टक्कर लेनी पडी़। तेरोडी़ ;करनालद्ध के समीप अमीनगढ़ के मैदान में दोनोंसेनाओं का बडा़ मुकाबला हुआ। महावत खान ने पहले आक्रमण किया। इस पर सिक्खों ने उसकी फौजों कोमात दे दी महावत खान ने कायरता प्रदर्शित की और हानि उठाकर पीछे हट गया।
फीरोज खान मेवाती पहली चोट में ही यु( की यह बुरी दशा देखकर बहुत चकित हो गया और वह अपने प्राणांे की बाजी़ लगाने पर उतर आया। फीरोज खान ने गुस्से में पागल होकर समस्त सेना को एक साथ सिक्खों पर टूट पड़ने का आदेश दिया। सिक्ख संख्या में आटे में नमक के बराबर भी नही थें। इसलिए वे इतने बडे़ आक्रमण में घिर गये फिर भी वे बहुत वीरता से लडे़ और अपने जीवन की आहुति देकर कडा़ मुकाबला किया और खालसा गौरव को बरकरार रखा।
परन्तु इस क्षेत्रा के लोगों ने भी मुग़ल सेना का साथ दिया। जिससे सिक्ख पराजित होकर पीछे हटने लगे। जिससमय अमीन क्षेत्रा मंे हुई विजय का समाचार बादशाह को मिला तो उसने प्रसन्न होकर 20 अक्तूबर को सरहिन्दकी फौजदारी फीरोज खान को प्रदान की और विशेष खिलअतें ;पुरस्कारद्ध भेजे।
अमीनगढ़ से दल खालसा पीछे हटता हुआ थानेसर पहुंच गया। परन्तु यहां भी किसी ओर से सहायताअथवा कुमक पहंुचने की आशा नहीं थी। अतः थानेसर में एक छोटी सी झड़प के बाद सिक्ख सढोरा नगर कीओर हटते गये ताकि आवश्यकता पड़ने पर लौहगढ़ के किले में पनाह ली जा सकें। विजय का समाचार सुनकरबादशाह स्वयं यु( का अंतिम परिणाम देखने के लिए 3 नवम्बर1710 ईú तरावडी़ जिसे आलमगीर पुर भी कहतेहैं पहंुचा।
(सोजन्य : क्रन्तिकारी गुरु नानक देव चैरिटेबल ट्रस्ट , लेखक : सरदार जसबीर सिंह)

मलेरकोटला पर आक्रमण

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शत्रु पर विजय प्राप्ति की दृष्टि से खालसा दल के नायक बंदा सिंह बहादुर ने अगला कदम मलेरकोटला की ओर बढाया। यहां के नवाबों ने श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी पर शाही सेना की ओर से बढ़-चढ़ कर आक्रमण किये थे। भले ही गुरूदेव के सपुत्रों की हत्या करवाने में उन का कोई हाथ नहीं था। इस समय उस परिवारके सभी पुरूष सदस्य गुरूदेव के हाथों अथवा छप्पड़ चीरी के रणक्षेत्रा मे मारे जा चुके थे।
जब दल खालसा मलेरकोटला पहुंचा तो वहां की स्थानीय जनता रक्तपात होने के भय से कांप उठी, उन्होंने तुरन्त अपना एक प्रतिनिध् िमण्डल बहुत बडी़ ध्न राशि नज़राने के रूप में देकर दल खालसा के नायक बंदा सिंह के पास भेजा। बंदा सिंह इस नगर को किसी प्रकार की क्षती पहुंचने के पक्ष में नहीं था क्योकि उसे ज्ञात हो गया था कि यहां के नवाब शेर मुहम्मद खान ने गुरूदेव के दोनों छोटे सुकुमारों की हत्या का विरोध् किया था।
साहबजादों के प्रति दिखाई सहानुभूति के कारण किसी प्रकार के प्रतिशोध् का प्रश्न ही नहीं उठता था। अतः वह प्रतिनिध् िमण्डल से बहुत सद्भावना भरे वातावरण में मिले और नज़ारने स्वीकार कर लिए, इस प्रतिनिध् िमण्डल में एक स्थानीय साहुकार किशन दास ने बंदा सिंह को पहचान लिया। लगभग दस वर्ष पूर्व एक बैरागी साध्ु के रूप में अपने गुरू रामदास के साथ माधे दास के नाम से उनके यहां जो व्यक्ति ठहरा था, वह यही बंदा सिंह बहादुर है।
इस रहस्य के प्रकट होते ही भय-प्रसन्नता में प्रवृत हो गया और सभी आपस में घुल मिल गये। तभी बंदा सिंह जी ने स्थानीय प्रतिनिध् िमण्डल को वचन दिया यदि यहां के शासक हमारी अध्ीनता स्वीकार कर लें तो यहां किसी का बाल भी बांका नहीं होने दिया जायेगा। तभी उन को बताया गया कि दल खालसा के आने की सूचना पाते ही वहां का फौजदार भाग गया है।लेरकोटला पर आक्रमण
(सोजन्य : क्रन्तिकारी गुरु नानक देव चैरिटेबल ट्रस्ट , लेखक : सरदार जसबीर सिंह)

छप्पड़ चीरी का ऐतिहासिक युध

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सरहिन्द के सुबेदार वजी़द खान को सूचना मिली कि बंदा सिंह के नेतृत्व मे दल खालसा और माझा
क्षेत्रा का सिंघो का काफला आपस मे छप्पड़ चीरी नामक गांव में मिलने मे सफल हो गया है और वे सरहिन्द
की ओर आगे बढने वाले हैं। तो वह अपने नगर की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, सिक्खों से लोहा लेने अपना
सैन्य बल लेकर छप्पड़ चीरी की ओर बढने लगा। दल खालसा ने वही मोर्चा बंदी प्रारम्भ कर दी। वज़ीद खान
की सेना ने आगे हाथी, उस के पीछे ऊंट, फिर घोड़ सवार और उस के पीछे तोपे व प्यादे ;सिपाहीद्ध। अंत मे
हैदरी झंडे के नीचे, गाज़ी जेहाद का नारा लगाते हुए चले आ रहे थे अनुमानतः इन सब की संख्या एक लाख
के लगभग थी। सरहिन्द नगर की छप्पड चीरी गांव से दूरी लगभग 20 मील है।
इध्र दल खालसा के सेनानायक जत्थेदार बंदा सिंह बहादुर ने अपनी सेना का पुनर्गठन कर के अपने
सहायक फतेह सिंह, कर्म सिंह, र्ध्म सिंह और आली सिंह को मालवा क्षेत्रा की सेना को विभाजित कर के उपसेना
नायक बनाया। माझा क्षेत्रा के सेना को विनोद सिंह और बाज सिंह की अध्यक्ष्ता मे ं मोर्चा बंदी करवा दी। एक
विशेष सैनिक टुकड़ी ;पलटनद्ध अपने पास संकट काल के लिए इन्दर सिंह की अध्यक्षता मे सुरक्षित रख ली
और स्वयं एक टीले ;टेकरीद्ध पर विराज कर यु( को प्रत्यक्ष दूरबीन से देखकर उचित निर्णय लेकर आदेश देने
लगे। दल खालसा के पास जो छः छोटे आकार की तोपे थी उन को भूमिगत मोर्चाे मंे स्थित कर के शाहबाज
सिंह को तोपखाने का सरदार नियुक्त किया। इन तोपों को चलाने के लिए बुंदेलखण्ड के विशेषज्ञ व्यक्तियों को
कार्यभार सौंपा गया। तोपचियों का मुख्य लक्ष्य, शत्राु सेना की तोपों को खदेड़ना और हाथियों को आगें न बढ़ने
देने का दिया गया, सब से पीछे नवसीखियें जवान रखे गये और उस के पीछे सुच्चा नंद के भतीजे गंडा मल
के एक हज़ार जवान थे ।
सूर्य की पहली किरण ध्रती पर पड़ते ही यु( प्रारम्भ हो गया। शाही सेना नाअरा-ए-तकबीर-
अल्लाह हू अकबर के नारे बुलंद करते हुए सिंघों के मोंर्चो पर टूट पडी़। दूसरी ओर से दल खालसा ने उत्तर में
फ्बोले सो निहाल, सत श्री अकालय् जय घोष कर के उत्तर दिया और छोटी तोंपों के मुंह खोल दिये। यह तोपे
भूमिगत अदृश्य मोर्चो में थी अंत इनकी मार ने शाही सेना की अगली पंक्ति उडा़ दी। बस फिर क्या था शाही
सेना भी अपनी असंख्य बडी़ तोपो का प्रयोग करने लगी। दल खालसा वृक्षों की आड़ में हो गया। जैसे ही शत्राु
सेना की तोपों की स्थिति स्पष्ट हुई शाहबाज सिंह के तोपचियों ने अपने अचूक निशानों से शत्राु सेना की तोपों
का सदा के लिए शांत करने का अभियान प्रारम्भ कर दिया जल्दी ही गोला-बारी बहुत ध्ीमी पड़ गई। क्योंकि
शत्राु सेना के तोपची अध्किांश मारे जा चुके थे। अब मुग़ल सेना ने हाथियों की कतार को सामने किया परन्तु
दल खालसा ने अपनी निधर््ारित नीति के अंतर्गत वही स्थिति रख कर हाथियों पर तोप के गोले बरसाए इस से
हाथियों में भगदड़ मच गई। इस बात का लाभ उठाते हुए घोड़ सवार सिंह शत्राु खेमे में घुसने में सफल हो गये
और हाथियों की कतार टूट गई। बस फिर क्या था? सिंघों ने लम्बे समय से हृदय में प्रतिशोध् की भावना जो
पाल रखी थी, उस अग्नि को ज्वाला बनाकर शत्राु पर टूट पडे़ घमासान का यु( हुआ। शाहीसेना केवल संख्या
के बल पर विजय की आशा लेकर लड़ रही थी, उन में से कोई भी मरना नहीं चाहता था जबकि दल खालसा
विजय अथवा शहीदी में से केवल एक की कामना रखते थे, अतः जल्दी ही मुग़ल फौजें केवल बचाव की लडाई
लड़ने लगे। देखते ही देखते शवों के चारों ओर ढेर दिखाई देने लगे। चारों तरफ मारो-मारो की आवाजें ही आ
रही थी। घायल जवान पानी-पानी चिल्ला रहे थे और दो घण्टों की गर्मी ने रणक्षेत्रा तपा दिया था। जैसे-जैसे
दोपहर होती गई जहादियों का दम टूटने लगा उन्हें जेहाद का नारा धेखा लगने लगा, इस प्रकार गा़जी ध्ीरे-ध्
ीरे पीछे खिसकने लगे। वह इतने हताश हुए कि मध्य दोपहरी तक सभी भाग खडे़ हुए। दल खालसे का मनोबल
बहुत उच्च स्तर पर था। वे मरना तो जानते थे, पीछे हटना नहीं। तभी गदद्ार सुच्चानंद के भतीजे गंडामल ने
जब खालसा दल मुग़लों पर भारी पड़ रहा था, तो अपने साथियों के साथ भागना शुरू कर दिया। इस से सिंघों
के पैर उखड़ने लगे क्योंकि कुछ नौसिखिए सैनिक भी गर्मी की परेशानी न झेलते हुए पीछे हटने लगे। यह
देखकर मुग़ल फौजियों की बाछें खिल उठी। इस समय अबदुल रहमान ने वजीद खान को सूचना भेजी फ्गंडामल
ब्रह्माण ने अपना इकरार पूरा कर दिखाया है, जहांपनाय्। इस पर वजीद खान ठहका मार के हंसा और कहने
लगा,फ्अब मरदूद बंदे की कुमक क्या करती है, बस देखना तो यहीं है। अब देरी न करो बाकी फौज भी
मैदान-ए-जंग में भेंज दो, इन्शा-अल्ला जीत हमारी ही होगी ।य्
दूसरी तरफ जत्थेदार बंदा सिंह और उसके संकट कालीन साथी अजीत सिंह यह दृश्य देख रहे थे।
अजीत सिंह ने आज्ञा मांगी फ्गंडामल और उस के सवारों को गद्दारी का इनाम दिया जायेय्। परन्तु बंदा सिंह
हंसकर कहने लगा फ्मैं यह पहले से ही जानता था खैर………..अब आप ताजा दम संकट कुमक लेकर विकट
परिस्थिियों में पडे़ सैनिकों का स्थान लोय् ।
अजीत सिंह तुरन्त आदेश का पालन करता हुआ वहां पहंुचा जहां सिंघों को कुछ पीछे हटना पड़ गया
था। फिर से घमासान यु( प्रारम्भ हो गया। मुग़लो की आशा के विपरीत सिंघों की ताजा दम कुमक ने रणक्षेत्रा
का पासा ही मोड़ दिया। सिंह फिर से आगे बढ़ने लगे। इस प्रकार यु( लड़ते हुए दोपहर ढलने लगी। जो मुग़ल
कुछ ही देर में अपनी जीत के अंदाजे लगा रहे थे। वह भूख-प्यास के मारे पीछे हटने लगे किन्तंु वह भी जानते
थे कि इस बार की हार उनके हाथ से सरहिन्द तो जायेगा हीऋ साथ में मृत्यु भी निश्चित ही है। अतः वह अपना
अंतिम दाव भी लगाना चाहते थे। इस बार वजीद खान ने अपना सभी कुछ दाव पर लगाकर फौज को ललकारा
और कहा -फ्चलो गा़जियों आगे बढ़ो और काफ़िरों को मार कर इस्लाम पर मंडरा रहे खतरे को हमेशा के लिए
खत्म कर दो। इस हल्ला शेरी से यु( एक बार फिर भड़क उठा। इस बार उपसेना नायक बाज सिंह, जत्थेदार
बंदा सिंह के पास पहुंचा और उसने बार-बार स्थिति पलटने की बात बताई। इस बार बंदा सिंह स्वयं उठा और
शेष संकट कालीन सेना लेकर यु( भूमि मे उतर गया। उसे देखकर दल खालसा में नई स्फूर्ति आ गई। फिर
से घमासान यु( होने लगा। इस समय सूर्यास्त होने में एक घण्टा शेष था। उपनायक बाज सिंह व फतेह सिंह
ने वजीद खान के हाथी को घेर लिया। सभी जानते थे कि यु( का परिणाम आखरी दाव में छिपा हुआ है, अतः
दोनांे ओर के सैनिक कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। सभी सैनिक एक-दूसरे से गुथम-गुथा होकर विजयी
होने की चाहत रखते थे।
ऐसे में बंदा सिंह ने अपने गुरूदेव श्री गुरू गोबिंद सिंह जी प्रदान वह बाण निकाला जो उसे संकट काल
सें प्रयोग करने के लिए दिया गया था। गुरूदेव जी ने उसे बताया था, वह बाण आत्मबल का प्रतीक है। इस के
प्रयोग पर समस्त अदृश्य शक्तियां तुम्हारी सहायता करेगी।
ऐसा ही हुआ देखते ही देखते वजीद खान मारा गया और शत्राु सेना के कुछ ही क्षणों में पैर उखड़ गये
और वे भागने लगे। इस समय का सिंहों ने भरपूर लाभ उठाया, उन्होंने तुरन्त मलेरकोटला के नवाब शेर मुहम्मद
खान तथा ख्वाजा अली को घेर लिया वे अकेले पड़ गये थे। उनकी सेना भागने में ही अपना भला समझ रही
थी। इन दोनों को भी बाज सिंह व फतेह सिंह ने रणभूमि में मुकाबले में मार गिराया। इनके मरते ही समस्त मुग़ल
सेना जान बचाती हुई सरहिन्द की ओर भाग गई। सिंघो ने उनका पीछा किया किन्तु जत्थेदार ने उन्हें तुरन्त
वापस आने का आदेश भेजा। उन का विचार था कि हमें समय की नजा़कत को ध्यान मे रखते हुए अपने घायलों
की सेवा पहले करनी चाहिए। उसके बाद जीते हुए सैनिकों की सामग्री कब्जे में लेना चाहिए। इस के बाद शहीदों
को सैनिक सम्मान के साथ अंतिम संस्कार उनकी रीति अनुसार करने चाहिए।
यह ऐतिहासिक विजय 12 मई सन्1710 को दल खालसे को प्राप्त हुई। इस समय दल की कुल संख्या
70 हजार के लगभग थी। इस यु( में 30 हजार सिंह काम आये और लगभग 20 हजार घायल हुए। लगभग
यही स्थिति शत्राु पक्ष की भी थी। उनके गा़जी अध्किांश भाग गये थे। यु( सामग्री में सिंघांे को 45 बडी़ तोपे,
हाथी, घोडे़ व बंदूके बडी़ संख्या मे प्राप्त हुई ।
नवसिखिये सैनिक जो भाग गये थे। उनमें से अध्किांश लौट आये और जत्थेदार से क्षमा मांग कर दल
में पुनः सम्मिलित हो गये। जत्थेदार बंदा सिंह ने खालसे-दल का जल्दी से पुनर्गठन किया और सभी को सम्बोध्
न कर के कुछ आदेश सुनाये:-
1़ कोई भी सैनिक किसी निर्दोष व्यक्ति को पीड़ित नहीं करेगा ।
2. कोई भी महिला अथवा बच्चों पर अत्याचार व शोषण नहीं करेगा। केवल दुष्ट का दमन करना है और
गरीब की रक्षा करनी है। इसलिए किसी की धर्मिक भवन को क्षति नहीं पहुचानी है।
3. हमारा केवल लक्ष्य अपराध्यिों को दण्डित करना तथा दल खालसा को सुदृढ करने के लिए यथाशक्ति
उपाय है।
14 मई को दल खालसे ने सरहिन्द नगर पर आक्रमण कर दिया। उन्हांेने सूबे वजीद खान का शव साथ
में लिया और उस का प्रदर्शन करने लगे। इस बीच बजीद खान का बेटा समंुद खान सपरिवार बहुत सा ध्न लेकर
दिल्ली भाग गया। उसे देखते हुए नगर के कई अमीरों ने ऐसा ही किया क्योकि उन्हें ज्ञात था कि शत्राु सेना के
साथ अब मुकाबला हो नहीं सकता। अतः भागने में ही भलाई है। जन साधरण भी जानते थे कि दल खालसा
अब अवश्य ही सरहिन्द पर कब्जा करेगा।
उस समय फिर रक्तपात होना ही है अतः कुछ दिन के लिए नगर छोड़ जाने में ही भलाई है। इस प्रकार
दल खालसे के सरहिन्द पहुंचने से पहले ही नगर में भागम भाग हो रही थी। दल खालसा को सरहिन्द में प्रवेश
करने में एक छोटी सी झड़प करनी पड़ी। बस फिर आगे का मैदान साफ था। सिंघों ने वजीद खान का शव सरहिन्द
के किले के बाहर एक वृक्ष पर उल्टा लटका दिया, उसमें बदबू पड़ चुकी थी। अतः शव को पक्षी नौचने लगे।
किले में बची-खुची सेना आकी होकर बैठी थी। स्वाभाविक था वे करते भी क्या? उनके पास कोई चारा नही
था। दल खालसा ने हथियाई हुई तोपों से किले पर गोले दागे, घण्टे भर के प्रयत्न से किले में प्रवेश का मार्ग
बनाने में सफल हो गये। फिर हुई हाथों-हाथ शाही सैनिकों से लडा़ई। बंदा सिंह ने कह दिया फ्अडे़ सो झडे़, शरण
पडे़ सो नरेय् के महा वाक्य अनुसार दल खालसा को कार्य करना चाहिए। इस प्रकार बहुत से मुग़ल सिपाही मारे
गये। जिन्होने हथियार फैंक कर दल खालसा से पराजय स्वीकार कर लीऋ उनको यु( बन्दी बना लिया गया।
दल खालसा के सेना नायक बंदा सिंह ने विजय की घोषणा की और अपराध्यिों का चयन करने को
कहा। जिससे उन्हें उचित दण्ड़ दिया जा सके परन्तु कुछ सिंघो का मत था कि यह नगर गुरू शापित है अतः
इसे हमें नष्ट करना है। किन्तु बंदा सिंह इस बात पर सहमत नहीं हुआ। उनका कहना था कि इस प्रकार निर्दोष
लोग भी बिना कारण बहुत दुख झेलेगें जो कि खालसा दल अथवा गुरू मर्यादा के विरू( है। बंदा सिंह की बात
में दम था अतः सिंह दुविध में पड़ गये। वे सरहिन्द को नष्ट करना चाहते थे। इस पर बंदा सिंह ने तर्क रखा
हमें अभी शासन व्यवस्था के लिए कोई उचित स्थान चाहिए। इस बात को सुनकर कुछ सिंह आकी को गये।
उन का कहना था सरहिन्द को सुरक्षित रखना गुरू के शब्दों में मुंह मोड़ना है। इस पर बंदा सिंह से अपनी राजध्
ानी मुखलिस गढ़ को बनाने की घोषणा की। सरहिन्द से मिले ध्न को तीन सौ बैल गाड़ियों में लाद कर वहां
पहुंचाने का कार्य प्रारम्भ कर दिया गया। तद्पश्चात इस गढ़ी का नाम बदल कर लौहगढ़ कर दिया और इसका
आगामी युधो को ध्यान में रखते हुए आधुनिक सेना बनाने का कार्यक्रम बनाया।

प्रथम सिक्ख राज्य की स्थापना

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12 मई 1710 को महान शहीद बाबा बन्दा सिंह बहादुर जी की अगवाई में चपड़चिड़ी के मैदान में सरहिन्द पर जीत प्राप्त की। इस चित्र में बाबा जी ने सरहिन्द की एक मस्जिद को अपने सेनिको द्वारा नष्ट न करने के आदेश दिए ।उन्होने ने फरमाया कि यह अल्लाह का घर है इसे किसी किस्म की नुक्सान नही पहुँचना चाहिये।
14 मई 1710 सरहिन्द पर पूर्ण कब्जा किया गया तथा
प्रथम सिक्ख राज्य की स्थापना की गयी।

शहीदों को शत शत प्रणाम।

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1716 में महान शहीद बाबा बन्दा सिंह बहादुर जी के साथ पकड़े गए 740 सिक्खों को 5 मार्च से 12 मार्च दिल्ली में चांदनी चौक के निकट (जहां आज कल पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने लाइब्रेरी है)100 सिक्खों को प्रतिदिन शहीद किया जाता था।इन सिक्खों में से एक ने भी इस्लाम धर्म स्वीकार नही किया अपितु हँसते हँसते शहीदी को चुना।
शहीदों को शत शत प्रणाम। 

बाबा बंदा सिंह बहादुर जी को यातनाएं और उनकी शहीदी

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दल खालसा के सिपाहियों की 12 मार्च1716 ईú तक सामूहिक हत्या का काम समाप्त हो गया था। परन्तु बंदा सिंह और उसके सहायक अध्किारियों को कई प्रकार की यातनाएं दी गई। उनसे बार-2 पूछा जाता था कि तुम्हारी सहायता करने वाले कौन लोग है और तुमने विशाल ध्न सम्पदा कहां छुपा कर रखी है? इस कार्य में मुग़ल प्रशासन ने तीन माह लगा दिये। परन्तु इस का परिणाम कुछ न निकला। सत्ताध्किारियों को इन लोगों से किसी प्रकार की कोई गुप्त सूचना न मिली।
अंत में 9 जून सन्1716 ईú को सूर्योदय के समय ही बंदा सिंह उसके चार वर्षीय पुत्रा अजय सिंह, सरदार बाज सिंह, भाई फतह सिंह, आली सिंह, बख्शी गुलाब सिंह इत्यादि को जो दिल्ली के किले में बंदी थे। उन्हें सरवहार खान कोलवाल और इब्राहीमुदीन खान मीर-ए-आतिश की देख-रेख में जलूस के रूप में किले से बाहर निकाला गया। जिस प्रकार इन्हें दिल्ली लाते समय किया गया था। उस दिन भी बेडियों में जकडे़ हुए बंदा सिंह को तिल्ले की कढाई वाली लाल पगड़ी और तिल्लेदार पोशाक पहनाई गई और हाथी पर बैठाया हुआ था। अन्य 26 सिक्ख जंजीरों से जकडे़ हुए उनके पीछे चल रहे थे। इस प्रकार इन्हें पुराने नगर की गलियों में से कुतुबमीनार के समीप भूतपूर्व बादशाह बहादुरशाह की कब्र की परिक्रमा करवाई गई।
बंदा सिंह को हाथी से उतार कर पृथ्वी पर बैठाया गया और उन्हें कहा गया कि या तो वह इस्लामस्वीकार करले अथवा मरने के लिए तैयार हो जाओ। परन्तु बंदा सिंह ने बहुत ध्ैर्य से मृत्यु को स्वीकार करइस्लाम कोठुकरा दिया। इस पर जल्लाद ने उसके पुत्रा को उस की गोदी में डाल दिया और कहा-लो इस कीहत्या करो। परन्तु क्या कोई पिता कभी अपने पुत्रा की हत्या कर सकता है? उन्होंने न कर दी।
बस फिर क्या था जल्लाद ने एक बड़ी कटार से बच्चे के टुकडे़-टुकडे़ कर दिये और उसका तड़पता हुआ दिल निकाल कर बंदा सिंह के मुंह में ठोंस दिया। ध्न्य था वह गुरु का सिक्ख जो प्रभु की इच्छा में अपनी इच्छा मान पत्थर की मूर्ति की भांति दृढ़ खड़ा रहा। जब बंदा सिंह विचलित न हुआ। समीप में खड़े मुहम्मद अमीन खान ने जब बंदा सिंह की ओर उस की आँखों में झांका तो उसके चेहरे की आभा किसी अदृश्य दिव्य शत्ति से जगमगा रही थी। वह इस रहस्य को देख हैरान रह गया। उसने कोतुहलवश बंदा सिंह से साहस बटोर कर पूछ ही लिया।
आप पर मुग़ल प्रशासन की तरफ से भयानक रत्तपात करने का दोष है जो अपराध् अक्षम्य है। परन्तु मेरे विचारों के विपरीत ऐसे दुष्ट कर्मों वाले के मुख-मण्डल पर इतना ज्ञान तेजोमय ज्योति क्यों कर झलकती है? तब बंदा सिंह ने ध्ैर्य के साथ उत्तर दिया-जब मनुष्य अथवा कोई शासन पापी और दुष्ट हो जाए कि न्याय का मार्ग छोड़ कर अनेक प्रकार के अत्याचार करने लग जाएं, तो वह सच्चा ईश्वर अपने विधन अनुसार उन्हें दण्ड देने के लिए मेरे जैसे व्यक्ति उत्पन्न करता रहता है। जो दुष्टों का संहार करें और जब उनका दण्ड पूरा हो जाए तो वह तुम्हारे जैसे व्यक्ति खड़े कर देता है ताकि उन्हें दण्डित कर दे।
इस्लाम न कबूल करने पर जल्लाद ने पहले कटार से बंदा सिंह की दाई आँख निकाल दी और फिर बाईं आंख। इसके पश्चात् गर्म लाल लोह की संडासी ;चिमटियोंद्ध से उनके शरीर के मांस की बोटियां खीच-खीचकर नोचता रहा। जब तक उनकी मृत्यु नहीं हो गई। इन सब यातनाओं में बंदा सिंह ईश्वर और गुरु को समर्पित रहा। वह पूर्णतः सन्तुष्ट था। उसने पूर्ण शांतचित, अडिग तथा स्थिर रह कर प्राण त्यागे। बाकी के सिक्ख अध्किारियों के साथ भी इसी प्रकार का क्रूर व्यवहार किया गया और सब की हत्या कर दी गई।
तत्कालीन इतिहासकारों के एक लिखित प्रसंग के अनुसार बादशाह फर्रूखसियार ने बंदा सिंह वा उसके साथियों से पूछ-ताछ के मध्य कहा – तुम लोगों में कोई बाज सिंह नाम का व्यक्ति है जिस के वीरता के बहुत किस्से सुनने को मिलते है? इस पर बेडियों और हाथकड़ियों में जकडे़ बाज सिंह ने कहा – मुझे बाज सिंह कहते है। यह सुनते ही बादशाह ने कहा-तुम तो बडे़ बहादुर आदमी जाने जाते थे। परन्तु अब तुम से कुछ भी नहीं हो सकता। इस पर बाज सिंह ने उत्तर दिया।
यदि आप मेरा करतब देखना चाहते है तो मेरी बेड़ियां खुलवा दे तो मैं अब भी आप को तमाशा दिखा सकता हूं। इस चुनौती पर बादशाह ने आज्ञा दे दी कि इसकी बेंिड़यां खोल दी जाये। बाज सिंह हिलने डुलने योग्य ही हुआ था कि उसने बाज की भांति लपक कर बादशाह के दो कर्मचारियों को अपनी लपेट में ले लिया और उन्हें अपनी हथकड़ियों से ही चित्त कर दिया और वह एक शाही अध्किारी की ओर झपटा परन्तु तब तक उसे शाही सेवकों ने पकड़ लिया और फिर से बेड़ियों में जकड़ दिया गया।
(सोजन्य : क्रन्तिकारी गुरु नानक देव चैरिटेबल ट्रस्ट , लेखक : सरदार जसबीर सिंह)

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